
श्रीराम, माता जानकी और लक्ष्मण जी
गुफा में स्थापित इन प्रतिमाओं के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुँचते हैं। प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक महत्व से भरा यह स्थान झारखंड की आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है।
मान्यता है कि त्रेतायुग में प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के चरण इसी भूमि पर पड़े थे। सैकड़ों फीट ऊँची पर्वतमाला के बीच बसा यह धाम सदियों से भक्तों की आस्था का केंद्र है।
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धाम का प्रसाद आप घर बैठे मंगा सकते हैं। बस एक छोटा-सा फॉर्म भरना है।


श्रीरामरेखा धाम झारखंड के दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल के सिमडेगा जिले में है। मान्यता है कि वनवास के समय श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के चरण यहाँ पड़े और उन्हीं की चरण-रज से यह स्थान पावन होकर आगे चलकर श्रीरामरेखा धाम कहलाया।
चट्टान के नीचे बनी विशाल गुफा की छत पर जो लंबी रेखा दिखती है, वही रामरेखा कही जाती है। गुफा के भीतर का दिव्य शंख, जिससे राम-नाम की ध्वनि निकलने की मान्यता है, श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है।
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गुफा में स्थापित इन प्रतिमाओं के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुँचते हैं। प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक महत्व से भरा यह स्थान झारखंड की आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है।

गुफा में भगवान जगन्नाथ, माता सुभद्रा और भगवान बलभद्र के विग्रह भी विराजमान हैं। इनके दर्शन से भक्तों के मन में श्रद्धा, भक्ति और शांति का संचार होता है।

वर्ष 1916 में स्थापित राधा-कृष्ण की प्रतिमाएँ यहाँ की पुरानी आस्था की पहचान हैं। इन्हें वस्त्रों, आभूषणों और रंग-बिरंगे फूलों से सजाया जाता है।
इसी समय से पवित्र गुफा में स्वयंभू शिवलिंग और राम-नाम की ध्वनि वाले शंख के दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालु आने लगे।
बीरूगढ़ के तत्कालीन राजा स्व. हुकूम सिंहदेव ने राधा-कृष्ण की धातु की प्रतिमा स्थापित करवाई और पहला रास मेला लगा।
ब्रह्मलीन श्रीश्री 1008 स्वामी जयराम प्रपन्नाचार्य जी (रामरेखा बाबा) ने मेले को पूरी तरह धार्मिक रूप दिया। रास मेले की जगह अखंड हरिनाम यज्ञ और सत्संग-प्रवचन होने लगे।
श्रीलंका की अशोक वाटिका से अयोध्या जा रही श्रीराम वनगमन काव्य यात्रा (रामरथ) रामरेखा धाम पहुँची।
ब्रह्मलीन पूज्य बाबा जी के प्रयास से ही मेले में अखंड हरिनाम यज्ञ, सत्संग और प्रवचन की परंपरा शुरू हुई। उनकी आध्यात्मिक शक्ति का प्रभाव दिन-प्रतिदिन श्रद्धालुओं में बढ़ता गया।
कार्तिक पूर्णिमा और माघ पूर्णिमा का मेला
हर वर्ष इन दोनों पर्वों पर झारखंड के अलग-अलग जिलों के साथ दूसरे राज्यों से भी लाखों श्रद्धालु धाम पहुँचते हैं। मेले की तैयारी रामरेखा धाम विकास समिति करती है, और सेवा में प्रशासनिक अधिकारी तथा कार्यकर्ता भी जुटते हैं।
इन राज्यों से आते हैं श्रद्धालु
रामरेखा धाम में गोमाता के संरक्षण, सेवा और संवर्धन पर विशेष जोर दिया जाता है। कोई भी श्रद्धालु गोदान कर सकता है। गोदान के बाद गौमाता की देखभाल और पालन-पोषण की जिम्मेदारी रामरेखा धाम की ओर से निभाई जाती है।

धाम सिमडेगा जिला मुख्यालय से लगभग 25 किमी पश्चिम में है। छोटी गाड़ियाँ पहाड़ के ऊपर तक पहुँच जाती हैं।
सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन राउरकेला (ओडिशा) है, जो धाम से करीब 95 किमी दूर है।
सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा रांची है, जो लगभग 185 किमी दूर है। वहाँ से टैक्सी या बस से धाम पहुँच सकते हैं।
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